जिस विश्रामगृह का निर्माण वन कर्मियों, अधिकारियों और संरक्षण से जुड़े कार्यों के लिए किया गया था, उसका इस तरह दुरुपयोग होना केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही पर सीधा हमला है।
घटना नहीं, व्यवस्था की नाकामी
यह मामला केवल एक रात का नहीं माना जा सकता। सवाल यह है कि
●बिना अनुमति या निगरानी के ऐसा आयोजन कैसे हुआ?
●क्या स्थानीय वन अधिकारी और प्रशासन अनजान थे?
●या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?
अगर प्रशासन को जानकारी नहीं थी, तो यह उनकी घोर अक्षमता है।
और अगर जानकारी थी, तो यह सीधा संरक्षण का मामला बनता है।
सुशासन के दावे और ज़मीनी हकीकत
भाजपा की साय सरकार लगातार सुशासन, संस्कृति और नैतिक मूल्यों की बात करती है। लेकिन जब सरकारी परिसरों में खुलेआम अश्लीलता को जगह मिलती है, तो ये दावे खोखले नजर आते हैं।
सरकारी संपत्ति का इस तरह उपयोग होना
शासकीय संपत्ति के दुरुपयोग,
प्रशासनिक नियमों की अवहेलना,
और नैतिक कानूनों के उल्लंघन की श्रेणी में आता है।
इसके बावजूद अब तक किसी ठोस कार्रवाई का न होना जनता के आक्रोश को और बढ़ा रहा है।
प्रशासन की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल
घटना के बाद प्रशासन की ओर से न तो स्पष्ट बयान आया, न ही दोषियों पर कार्रवाई की सूचना। यह चुप्पी कई शंकाओं को जन्म देती है। क्या मामला दबाने की कोशिश हो रही है?
क्या प्रभावशाली लोगों को बचाया जा रहा है?
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसे मामले आम होते चले जाएंगे।
अब आगे क्या?
जनता की मांग स्पष्ट है-मामले की उच्चस्तरीय व निष्पक्ष जांच,
दोषी अधिकारियों और आयोजकों पर कानूनी कार्रवाई,
और शासकीय विश्रामगृहों के उपयोग पर सख्त निगरानी व्यवस्था।कुमेली का यह मामला चेतावनी है।
अगर अब भी सरकार और प्रशासन नहीं जागे,तो यह सिर्फ एक खबर नहीं रहेगी-बल्कि जनता के भरोसे के टूटने की कहानी बन जाएगी।


0 टिप्पणियाँ