जिलाध्यक्ष शशि सिंह द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि संगठन विरोधी गतिविधियों और लगातार इस्तीफों को बढ़ावा देने के आरोपों के चलते यह कड़ा निर्णय लिया गया है। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ समय से जिला कांग्रेस में कई पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के इस्तीफे सामने आए थे, जिसके लिए संगठन के भीतर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा था।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष का कहना है कि पार्टी की अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी और जो भी नेता या कार्यकर्ता संगठन की एकता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस एक अनुशासित संगठन है और पार्टी लाइन से हटकर काम करने वालों को किसी भी सूरत में संरक्षण नहीं दिया जाएगा।
वहीं दूसरी ओर, नरेश रजवाड़े समर्थकों का कहना है कि निष्कासन की कार्रवाई एकतरफा और जल्दबाजी में की गई है। उनका आरोप है कि संगठन में व्याप्त आंतरिक मतभेदों को सुलझाने के बजाय सीधे कार्रवाई करना उचित नहीं है। जिले में इस फैसले को लेकर कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा और असंतोष दोनों देखने को मिल रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सूरजपुर जिला कांग्रेस में चल रही यह खींचतान आगामी राजनीतिक गतिविधियों पर असर डाल सकती है। संगठन के भीतर सामंजस्य बनाए रखना किसी भी दल के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है, खासकर तब जब प्रदेश स्तर पर भी राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हों।
सूत्रों के अनुसार, जिला स्तर पर जल्द ही बैठक बुलाई जा सकती है, जिसमें हालिया घटनाक्रम पर चर्चा होगी और संगठन को मजबूत करने के लिए नई रणनीति बनाई जाएगी। यह भी माना जा रहा है कि प्रदेश नेतृत्व इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप कर सकता है।
फिलहाल सूरजपुर की राजनीति में यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। लगातार इस्तीफों के आरोप, निष्कासन की कार्रवाई और बढ़ते संगठनात्मक विवाद ने कांग्रेस की जिला इकाई को सुर्खियों में ला दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी इस आंतरिक संकट से कैसे उबरती है और संगठनात्मक एकता को किस तरह मजबूत करती है।
हालाँकि ये ख़बर भाँग से बनी बर्फी खाकर लिखी गयी है इसका वास्तविकता से कोई भी लेना देना नही है।

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