सूरजपुर कांग्रेस में अंतर्कलह: नियुक्ति के तीन दिन बाद इस्तीफा

 ● जिला कांग्रेस सूरजपुर में हलचल, उपाध्यक्ष उषा सिंह का इस्तीफा बना मुद्दा

सूरजपुर। सूरजपुर जिला कांग्रेस कमेटी में संगठनात्मक अस्थिरता एक बार फिर सतह पर आ गई है। 9 फरवरी को जिला उपाध्यक्ष पद पर नियुक्ति और 12 फरवरी को इस्तीफा-यह घटनाक्रम महज़ संयोग नहीं, बल्कि संगठन के भीतर गहराते असंतोष और नेतृत्व संकट का संकेत है।

इस्तीफा देने वाली उषा सिंह कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं हैं। वे सरगुजा के पूर्व सांसद एवं प्रेमनगर विधानसभा के पूर्व विधायक श्री खेलसाय सिंह की बहू हैं। स्वयं पूर्व जिला पंचायत सदस्य रह चुकी उषा सिंह का सामाजिक-राजनीतिक आधार मजबूत रहा है। साथ ही उनका सरगुजा राजपरिवार और पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंह देव के साथ नजदीकी संबंध पार्टी के भीतर उनके कद को और स्पष्ट करता है।

ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि इतनी अनुभवी और प्रभावशाली नेत्री को महज़ तीन दिन के भीतर पद छोड़ने की स्थिति क्यों आई?

वर्तमान जिलाध्यक्ष सुश्री शशि सिंह, जो पूर्व मंत्री तुलेश्वर सिंह की पुत्री हैं, के नेतृत्व में जिला कांग्रेस की कार्यशैली पर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। संगठन के भीतर यह चर्चा आम है कि निर्णय प्रक्रिया सीमित दायरे में सिमट कर रह गई है और वरिष्ठ व प्रभावशाली नेताओं को अपेक्षित सम्मान व भूमिका नहीं मिल पा रही है। उषा सिंह का इस्तीफा इसी असंतुलन को उजागर करता है।

हालाँकि इस्तीफे में स्वास्थ्य कारणों का उल्लेख किया गया है, लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि वास्तविक कारण संगठन के भीतर तालमेल की कमी और नेतृत्व से संवाद का अभाव है। यदि नेतृत्व समावेशी और संतुलित होता, तो नियुक्ति के कुछ ही दिनों में ऐसा कदम उठाने की नौबत शायद नहीं आती।

शशि सिंह का जिलाध्यक्ष पद पर होना जहाँ एक ओर युवा नेतृत्व के रूप में देखा गया, वहीं दूसरी ओर यह भी सवाल खड़े हुए कि क्या संगठन अनुभव और वरिष्ठता को पर्याप्त महत्व दे पा रहा है? उषा सिंह का हटना इस आशंका को और मजबूत करता है कि सूरजपुर कांग्रेस में नेतृत्व केवल पदों तक सीमित है, जमीनी समन्वय कमजोर पड़ रहा है।

यह स्थिति कांग्रेस के लिए चिंताजनक है। सूरजपुर जैसे जिले में, जहाँ सामाजिक समीकरण और पारिवारिक-राजनीतिक प्रभाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, वहां संगठन के भीतर इस तरह की अंतर्कलह पार्टी को चुनावी तौर पर नुकसान पहुँचा सकती है।

अब निगाहें प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व पर टिकी हैं। क्या वह इस घटनाक्रम को गंभीर चेतावनी मानकर जिलाध्यक्ष के नेतृत्व और संगठनात्मक ढांचे की समीक्षा करेगा, या फिर यह असंतोष भीतर-ही-भीतर सुलगता रहेगा?

उषा सिंह का इस्तीफा केवल एक पद त्याग नहीं, बल्कि सूरजपुर कांग्रेस में नेतृत्व की कार्यशैली पर लगा एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

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