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| ●फाइल फोटो |
सूरजपुर| ग्रामीण इलाकों में आम जनता के लिए ऑटो रिक्शा ही सबसे सुलभ और ज़रूरी परिवहन साधन है। अस्पताल, स्कूल, बाज़ार और सरकारी दफ्तरों तक पहुंचने के लिए ग्रामीण लोग इन्हीं पर निर्भर हैं। लेकिन अब यही ऑटो रिक्शा चालक मनमाना किराया वसूलकर ग्रामीणों का शोषण करने लगे हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि महज 5 किलोमीटर की दूरी के लिए 20 रुपये की मांग की जा रही है। यह घटना किसी एक गांव या एक दिन की नहीं, बल्कि लगभग हर ग्रामीण क्षेत्र की रोज़मर्रा की हकीकत बन चुकी है।
ग्रामीण इलाकों में न तो मीटर की व्यवस्था है, न ही कोई सरकारी रेट लिस्ट। इसी का फायदा उठाकर ऑटो चालक मनचाहा किराया तय कर लेते हैं। मजबूरी में किसान, मज़दूर, छात्र और महिलाएं बहस भी नहीं कर पाते, क्योंकि विकल्प के नाम पर कुछ नहीं होता।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि
●क्या ग्रामीण जनता के लिए नियम लागू नहीं होते?
●क्या परिवहन विभाग सिर्फ शहरों तक ही सीमित है?
यदि प्रशासन वास्तव में आम जनता के हित में काम करता है, तो उसे तुरंत
- ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग रेट लिस्ट तय करनी चाहिए,
- ग्राम पंचायत, हाट-बाज़ार, बस स्टैंड और अस्पतालों में रेट चार्ट चस्पा कराना चाहिए,
- ऑटो चालकों का पंजीकरण और पहचान नंबर अनिवार्य करना चाहिए,
- शिकायत के लिए सरल और स्थानीय स्तर पर व्यवस्था बनानी चाहिए,
- नियम तोड़ने वालों पर सख्त जुर्माना और परमिट रद्द करने की कार्रवाई करनी चाहिए।
यह स्वीकार्य है कि ईंधन महंगा हुआ है, लेकिन उसकी आड़ में गरीब ग्रामीणों से मनमानी वसूली किसी भी हाल में जायज़ नहीं ठहराई जा सकती। यदि समय रहते प्रशासन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया, तो यह समस्या आगे चलकर ग्रामीण आक्रोश और अव्यवस्था का कारण बन सकती है।
अब जरूरत है केवल आश्वासन की नहीं, बल्कि तत्काल और ज़मीनी कार्रवाई की।
वरना सवाल यही रहेगा-
क्या ग्रामीण जनता की मजबूरी ही सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है?

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