सूरजपुर कांग्रेस में नियुक्तियों की राजनीति, संगठन से ज्यादा गुट हावी

● ब्लॉक के बाद मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति में भी एक ही खेमे का कब्जा, जिलाध्यक्ष बने “बिना सेना के सेनापति

● सूरजपुर कांग्रेस में संगठन की दिशा: टी.एस. बाबा की पकड़ और जिलाध्यक्ष की सीमाएँ


सूरजपुर।
कांग्रेस संगठन की मजबूती केवल पदों के वितरण से नहीं, बल्कि स्पष्ट सोच, जमीनी पकड़ और कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने की क्षमता से तय होती है। सूरजपुर जिले में ब्लॉक अध्यक्षों के बाद मंडल अध्यक्षों की नियुक्तियों ने यह बहस तेज कर दी है कि संगठन को दिशा देने वाली असली ताकत कहां से आ रही है। मौजूदा हालात में यह साफ नजर आता है कि टी.एस. बाबा के नेतृत्व और उनके समर्थकों की भूमिका निर्णायक रही है।

टी.एस. बाबा को छत्तीसगढ़ कांग्रेस में एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने संगठन को नीचे से ऊपर तक मजबूत करने पर हमेशा जोर दिया है। सूरजपुर जिले में उनके समर्थकों को मंडल स्तर पर जिम्मेदारी मिलना केवल गुटीय संतुलन नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही संगठनात्मक तैयारी और सक्रियता का परिणाम माना जा रहा है। यही वजह है कि इन नियुक्तियों के बाद संगठन में एक स्पष्ट संदेश गया है कि नेतृत्व उसी के पास जाता है, जो समय पर संगठन को दिशा दे सके।

दूसरी ओर, जिलाध्यक्ष शशि सिंह की भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग मत देखने को मिलते हैं। यह सही है कि जिलाध्यक्ष पद की अपनी सीमाएँ और दबाव होते हैं, लेकिन संगठन के कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि ब्लॉक और मंडल स्तर पर समन्वय और संवाद की अपेक्षित मजबूती दिखाई नहीं दी। परिणामस्वरूप, संगठनात्मक फैसलों में वह प्रभाव नजर नहीं आया, जिसकी उम्मीद जिलाध्यक्ष से की जाती है।

राजनीतिक चर्चाओं में यह बात बार-बार सामने आ रही है कि यदि जिला स्तर पर संगठनात्मक नियंत्रण और स्पष्ट रणनीति पहले से मजबूत होती, तो नियुक्तियों को लेकर इतनी बहस और असंतोष की स्थिति नहीं बनती। यही कारण है कि संगठन को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी स्वाभाविक रूप से उस खेमे के हाथ में चली गई, जहां स्पष्ट योजना और जमीनी संपर्क मौजूद था -और वह भूमिका टी.एस. बाबा के समर्थकों ने निभाई।

टी.एस. बाबा के पक्ष में यह कहना गलत नहीं होगा कि उन्होंने सूरजपुर कांग्रेस को एक संगठित ढांचे में ढालने की कोशिश की है। जिन कार्यकर्ताओं को लंबे समय से अवसर की प्रतीक्षा थी, उन्हें अब जिम्मेदारी मिलती दिख रही है। इससे संगठन में सक्रियता बढ़ी है और भविष्य को लेकर एक नई उम्मीद भी जगी है।

वहीं, जिलाध्यक्ष शशि सिंह के सामने अब यह चुनौती है कि वे संगठन के भीतर अपनी भूमिका को और अधिक प्रभावी बनाएं। केवल पद पर बने रहना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि सभी गुटों को साथ लेकर चलना, जमीनी कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद और निर्णयों में स्पष्टता ही किसी जिलाध्यक्ष की असली पहचान होती है।

सम्पादकीय दृष्टि से देखा जाए तो सूरजपुर कांग्रेस की मौजूदा तस्वीर यह संकेत देती है कि संगठन फिलहाल टी.एस. बाबा की राजनीतिक समझ और उनके समर्थकों की सक्रियता के सहारे आगे बढ़ रहा है। यदि जिला नेतृत्व इस स्थिति से सबक लेते हुए अपनी भूमिका को और मजबूत करता है, तो संगठन को लाभ होगा। अन्यथा, नेतृत्व का संतुलन उसी ओर झुकता रहेगा, जहां दिशा, रणनीति और भरोसा दिखाई देता है।

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